मुख्‍य समाचार

1 रायपुर। बच्चों के विकास मे प्रमुख भूमिका निभा रहा सजग कार्यक्रम : ऑडियो क्लिप के माध्यम से सुनाए जा रहे प्रेरक संदेश,रायपुर। मुख्यमंत्री की रेडियो वार्ता ’लोकवाणी’ की 12 वीं कड़ी का प्रसारण 8 नवम्बर को : लोकवाणी ’बालक-बालिकाओं की पढ़ाई, खेलकूद, भविष्य’ विषय पर केन्द्रित होगी,राजनांदगांव। नगरीय प्रशासन मंत्री डॉ. शिवकुमार डहरिया 4 नवम्बर को राजनांदगांव जिले के दौरे पर रहेंगे मिशन अमृत योजना के तहत 8.5 करोड़ के विकास कार्यों का करेंगे लोकार्पण ,राजनांदगांव : उपायुक्त कृषि विभाग डॉ. सोनकर ने किया गोधन न्याय योजना के कार्यों का निरीक्षण : योजना की सफलता का मूल मंत्र गौठानों का सफल संचालन, राजनांदगांव। छत्तीसगढ़ राज्य स्थापना दिवस के अवसर पर आयोजित राज्योत्सव में मुख्यमंत्री ने राजीव गांधी किसान न्याय योजना के तहत जिले के 1 लाख 65 हजार किसानों के खाते में 178 करोड़ रूपए की राशि अंतरित की

रविवार, 5 अप्रैल 2020

गुल्‍ली डंडा और प्रेमचंद के चौके छक्‍के

यशपाल जंघेल
        जमाना टी-ट्वेन्टी का है। हर तरफ चौके-छक्के लग रहे हैं। सारा देश तालियों की शोर में डूबा जा रहा है। हम क्रिकेट को देख ही नहीं रहे हैं, उसे जी रहे हैं अपने अंदर और बाहर दोनो जगह। आज हम क्रिकेट को ओढ़ रहे हैं, बिछा रहे हैं। ऐसे वक्त में यह सवाल उठना स्वाभाविक है-’कहीं हम दूसरी गुलामी की ओर तो नहीं बढ़ रहे हैं ? खेल का मजा लेेते - लेते हम स्वयं किसी खतरनाक खेल का हिस्सा तो नहीं बन रहे हैं ? क्रिकेट खेलना अच्छी बात है। क्रिकेट देखना भी अच्छी बात है। क्रिकेट के प्रति दीवानगी को भी हम बुरा नहीं समझते, लेकिन दीवानगी, जब गुलामी की हद पार कर जाय, तो यह चिंताजनक ही नहीं खतरनाक भी होती है।
अंग्रेजों की इस घातक गुगली को महान कथाकार ’मुंश्‍ाी प्रेमचंद’ ने आज से लगभग नब्बे वर्ष पहले ही पढ़ लिये थे और उन्होंने कहानी लिखी ’गुल्ला डंडा’। वैसे तो हम इस कहानी को अंग्रेजी खेल और पारंपरिक भारतीय खेलों के बीच के द्वंद्व के रुप में चिह्नांकित कर सकते हैं। क्रिकेट के आगमन के पश्चात् भारतीय खेलों की जो दुर्दशा हुई है, वह किसी से छिपी नहीं है। खेलों के व्यावसायीकरण का सबसे ज्यादा फायदा क्रिकेट को ही हुआ है। भारत आज विश्‍व क्रिकेट का सिरमौर हो गया है। हम अपनी पीठ थपथपाते थक नहीं रहेे हैं। यह तो ऐसा ही है, जैसे विश्‍व के धनकुबेरों की सूची में भारतीयों की बढ़ती संख्या को देखकर हम मान लेते हैं कि भारत से गरीबी दूर हो रही है।
          क्या यह सिर्फ पाश्‍चात्य और भारतीय खेलों के बीच के टकराव की कहानी है ? नही यह भारतीय जन-समूह की गुलाम मानसिकता की कहानी भी है। प्रेेमचंद इस कहानी में लिखते हैं- ’’ हम अंग्रेजी चीजों के पीछे ऐसे दीवाने हो रहे हैं, कि अपनी सभी चीजों से अरुचि हो गई। ’’ जब भी हम यूरोप में कोई कौतूहलजनक चीजें देखते हैं, तो फौरन नया - नया चिल्ला उठते हैं। जबकि अधिकतर चीजें पुरानी ही होती है। केवल कवर को रंग - बिरंगा बनाकर, सजा - धजाकर पुरानी चीजें ही हम तक परोसी जाती हैं। जिस समय यह कहानी लिखी गयी, वह अंग्रेजी उपनिवेशवाद का क्रूर गवाह है। उस समय वे भले ही राजनीतिक रुप से अंग्रेजों के गुलाम थें, लेकिन लोगों की मानसिक गुलामी मुंश्‍ाी प्रेमचंद को असाह्य थी। सन् 1926 में प्रकाश्‍िात कहानी संग्रह ’ प्रेम द्वादश्‍ाी ’ की भूमिका मेें उन्होंने लिखा है - ’’ हम पराधीन है, लेकिन हमारी सभ्यता पाश्‍चात्य सभ्यता से कहीं ऊँची है। यथार्थ पर निगाह रखने वाला योरप हम आदर्श्‍ावादियों से जीवन - संग्राम में बाजी भले ही ले जाय; पर हम अपने परंपरागत संस्कारों का त्याग नहीं कर सकते।’’
         जरुरी नहीं कि एक कहानी के अंदर एक ही कहानी हो। और यह भी जरुरी नहीं कि हम उस कहानी को पूरी तरह पकड़ सकें जो कहानीकार ने लिखनी चाही है। किसी रचना में एक अर्थ ही ध्वनित नहीं होते। और होने भी नहीं चाहिए। प्रसिद्ध आलोचक रामस्वरुप चतुर्वेदी तो एक अर्थ के भी कई स्तर मानते हैं। अधिकतर आलोचक गुल्ली डंडा को वर्ग-संघर्ष की कहानी के रुप में परिभाषित करने की कोशिश करते हैं। इस कहानी के ’मैं’ और ’गया’ को क्रमशः शोषक और श्‍ाोषित वर्ग के प्रतिनिधि के रुप में डिकोड करने का लगातार प्रयास किया गया है।  गुल्ली डंडा को वर्ग संघर्ष तक सामित करना मैं समझता हूं इस कहानी के प्रति अन्याय होगा। इस कहानी में उन कारणों की पड़ताल की गईं हैं, जिससे आम आदमी के विरोध करने की क्षमता को लगातार कुंठित की जाती रही है। यह दुनिया ही वस्तुतः गुल्ली डंडा के खेल का मैदान है, जहां आम आदमी भी उस गया की तरह है, जो अपने खिलाफ होने वाले अत्याचार का विरोध नहीं कर पाता। किस कारण सेे ? इसका कारण है, सभ्यता का आवरण, जो गया और कहानी के मैं के बीच अफसरपन के दीवार के रुप में खड़ा हो जाता है।
                  दरअसल, आम आदमी के मन में षुरु से ही डर का बीज बोया जाता है। जिसे उसका सारा परिवेश्‍ा जीवन भर सीचता रहता है। इसी कारण वह अपने अधिकारों को जानकर भी अन्याय का विरोध नहीं कर पाता। गया, जो गुल्ली डंडा के सारे नियम-कायदे जानता है, फिर भी अपने खिलाफ वाले अन्याय व धांधली को वह चुपचाप सहन कर लेता है। क्योंकि उसके अंदर बहुत पहले से भय का बीज बोया गया, जो बाद में एक विषाल वृक्ष का रुप ले लिया। उपनिवेषकाल से ही लोक-मानस में अभिजात्य वर्ग के प्रति आत्मसर्पण का भाव संस्कार के रुप में या कहें कुसंस्कार के रुप में विद्यमान रहा है। इसके पीछे पूर्व में सैकड़ोें वर्षों तक विदेषी षासन की ज्यादतियां हो सकती हैं। बच्चों के बीच सभ्यता का आवरण उतना मजबूत नहीं होता। यही कारण है, कि गया, गुल्ली डंडा के खेल में इस कहानी के ’मैं’ का पुरजोर विरोध ही नहीं करता, उसकी गाल में एक जोरदार चांटा भी रसीद कर देता है। इनसान ज्यों-ज्यों बड़ा होता है, सभ्यता के आवरण से घिरता जाता है और उसके मन को घेरने लगता है डर, परिवार का डर, समाज का डर, प्रशासन का डर, प्रषासक का डर और उससे ज्यादा उसके करिंदों का डर। समाज के तथाकथित षिक्षित व्यक्तियों की स्थिति भी गया से भिन्न नहीं है। अंग्रेजों द्वारा जो षिक्षा, प्रारंभ की गई, उसने आम आदमी को गुलाम बनाने का ही काम किया है। उसी षिक्षा-नीति को हम आज भी ढोने के लिए मजबूर हैं। ’सहायक संधि’ अंग्रेजों की राजनीतिक गुलामी का अचूक अस्त्र थी, तो उनकी षिक्षा-नीति मानसिक गुलामी का।
          मध्यवर्ग का व्यक्ति जो अपने आपको बुद्धजीवी भी कहता है शेष जगत के साथ अपने हृदय के सामंजस्य स्थापन में असफल होता रहा है। व्यक्ति के रुप में भी और वर्ग के रुप में भी। परिणामस्वरुप मध्यवर्ग, निम्नवर्ग से लगातार कटा हुआ है। बिल्कुल गुल्ली डंडा कहानी के ’मैं’ और गया की तरह। जब तक दोनो वर्ग साथ नहीं आयेंगे, वे तीसरे वर्ग अर्थात सत्‍ता से चिपके शोषक-तत्‍वों को चुनौती नहीं दे पायेंगे। विडंबना है कि यह पहले भी नहीं हुआ और आज भी नहीं हो पा रहा रहा है। एक ओर मध्यवर्ग को लेकर निम्नवर्ग में कई तरह की भा्रंतियां पहले से मौजूद रही हैं। वहीं दूसरी ओर मध्यवर्ग, हमेषा से निम्नवर्ग के खिलाफ पूंजीवादी ताकतों का मोहरा बनता आया है। आज दोनों के बीच एक चौड़ी और गहरी खाई बन गई है, जिसे पाटना आसान काम नही है।
               गुल्ली डंडा वस्तुतः दो वर्गों के बीच के संघर्ष की कहानी नहीं, बल्कि दो वर्गों के बीच के अलगाव की कहानी है। उनके अलगाव का फायदा निश्चित रुप से षोषक-वर्ग को ही होता है। गुल्ली डंडा यद्यपि उपनिवेशकाल में लिखी गयी कहानी है, लेकिन यह आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। उपनिवेषकाल में भारतीय समाज दो वर्गों में विभाजित था- पहला पढ़ा-लिखा मध्यवर्ग, जिसका प्रतिनिधित्‍व इस कहानी का ’मैं’ करता है और दूसरा- अनपढ़ और उपेक्षित निम्न वर्ग जिसका प्रतिनिधित्‍व गया करता है। ये दोनों ही वर्ग शोषित और पीड़ित थे। पढ़ा-लिखा मध्यवर्ग अंग्रेजों से और अनपढ़ व उपेक्षित निम्न वर्ग, अंग्रेजों तथा मध्यवर्ग दोनों से पीड़ित था। अंग्रेज जो सत्‍ता के शीर्ष में थे, दोनो वर्गों को नियंत्रित करते थे। तब दोनों, पीड़ित वर्ग एक साथ आए, यह उस समय की आवष्यकता थी। अंग्रेज इस तथ्य से भली-भांति परिचित थे। इसलिए वे पढ़े-लिखे मध्यवर्ग को आम आदमी के खिलाफ अपने मोहरे के रुप में इस्तेमाल करते थे। फलतः समाज के अनपढ़ व पिछड़े व्यक्ति मध्यवर्ग को अपना दुश्‍मन समझने लगे। इसका लाभ अंग्रेजों को मिलता रहा। दोनों वर्गों के बीच अविश्‍वास का एक मोटा पर्दा बना रहा। इस चक्कर में वे वास्तविक शोषकों अर्थात अंग्रेजों का विरोध करना तो दूर उसे अपना हितैषी ही समझते रहें। सत्‍तासीन वर्ग द्वारा आम लोगों के विरोध करने की क्षमता को कुंठित करने के प्रयास को उपनिवेशकाल से लेकर समसामायिक संदर्भ तक देखा जा सकता है।
            जो सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियां उस समय विद्यमान थीं, क्या वे बदल चुकी हैं ? नही .......समय बदला है, षासक बदले हैं, समस्याएं ज्यों की त्यों खड़ी हैं। परिस्थितियां यथावत हैं। मुंशी प्रेमचंद अपने युग के शाश्‍वत सत्य को पकड़ने वाले बेहद संजीदा कथाकार हैं। यही कारण है कि प्रसिद्ध कथालोचक ’गोपाल राय’ अपनी किताब ’हिन्दी कहानी का इतिहास’ में उनके बारे में लिखते हैं- ’’ प्रेमचंद वास्तव में ’कहानी’ कम ’समय’ ज्यादा लिख रहे थे ..........। समय का गंभीर अध्येता ही समय को लिख सकता है। मुंशी प्रेमचंद अपने युग की प्रत्येक सांस को पढ़ रहे थे और उसे अपनी लेखनी में उतार रहे थे। उन्होंने समय को पहचाना ही नहीं, बल्कि बार-बार उसका अतिक्रमण भी किया है। जो सत्य उन्होंने अपनी कहानियों में पकड़ा है, वह उसके युग का ही नहीं, युग-युग का सत्य हैैै। अब सवाल यही है, कि हम अब तक उस सत्य का कितना साक्षात्कार कर पाये हैं।
 - यशपाल जंघेल
ग्राम पोष्ट - साल्हेवारा
जिला - राजनांदगांव
मो 9009910363
yjanghel71@gmail.com   

1 टिप्पणी:

  1. वाह जंघेल जी,,, हम क्या टिप्पणी करें,,, कुछ दिमाग में आएगा तब न कर पायेंगे,,, इतना हम जानते हैं आपने अद्भुत समीक्षा की है,,,, अशेष शुभकामनाएं

    जवाब देंहटाएं