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रविवार, 22 मार्च 2020

'डोमकच''--एक भोजपुरी क्षेत्रीय लोक नाट्य परम्परा**

पद्मा मिश्रा 

         आधी  रात का समय था, अर्धनिद्रा में निमीलित मेरी आंखे समवेत नारी स्वर में गाये जारहे एक गीत को सुन कर अचानक जाग उठीं. ''गाँव  के आरीआरी मारे सिसकारी, आरे माई नैहर में सुन लीं,सासुरे में पियवा बा नादान, ''मै उस गीत की इतनी बेबाक और उन्मुक्त अभिव्यक्ति पर चौंक उठी. ...फिर याद आया, मेरे घर से तीसरे मकान में आज बेटे की बरात विदा हुई थी, वहीं ये आयोजन हो रहा था. मै भी उत्सुकतावश वहां जा पहुँची, एक बुजुर्ग महिला ने मेरा स्वागत किया, और मै भी उत्सव में शामिल हो गयी. उस बुजुर्ग अम्मा ने ही बताया की इसे ''डोम कच 'कहते हैं. जब वर अपनी बरात लेकर प्रस्थान करता है तो पीछे छूट गयी सारी महिलायें इसी प्रकार नृत्य, गान, नाटक आदि करती हुई सारी रात जागती हैं, सुबह होने तक. वहां वधु के घर जब विवाह की रस्मे प्रारम्भ होती हैं ,इधर डोम कच प्रारम्भ हो जाता है. विवाह समपन्न होने तक सारी रात यह नृत्य  गान -नाटिका चलती रहती है. एक नाटक खेला जाता है, जिसकी रोचकता यह होती है घर के सारे पुरुषों के बरात के संग चले जाने परअकेली महिलाए बिंदास हो पूरे खुलेपन के साथ भावनाए अभिव्यक्त करती हैं.
           ''डोम कच , नकटा या नकटौरा नाटक शब्द का ही अपभ्रंश रहा होगा ,कालान्तर में जिसे उच्चारण की सुविधा की दृष्टि से ''नकटा' या नकटौरा ''कहा जाने लगा. लोक नाट्य की यह परम्परा जब ''डोम कच'' के नाम से जानी गयी तो इसका अभिप्राय यही था की पूर्व में संभ्रांत घरों की महिलायें सार्वजनिक टूर पर समाज के सामने नहीं आ पाती थीं .और नाटक, नृत्य आदि में उनका भाग लेना सामाजिक लोक लाज की दृष्टि से वर्जित था ,अत; जाट जाटिन,धोबिन, ,या डोम डोमिन के द्वारा ही इस इस नाटक को अभिनीत किये जाने की परम्परा का निर्वाह किया जाता रहा होगा. जिस प्रकार की उन्मुक्तता और बिंदास पन उन गीतों में प्रस्तुत किया जाता है, वह संभ्रांत महिलायें उतनी सहजता से प्रस्तुत नहीं कर पाती होंगी, .......पर आज समय बदल गया है. आज तो पढी लिखी महिलायें भी बढ़ चढ़ कर इस गीत, नाटक में हिस्सा लेती हैं, ...शायद इसी बहाने सास ननदों पर कटूक्तियां कर अपने मन का सारा तनाव भी धो पोंछ कर बहा डालती हैं. -----''ये जी, सासू के बोलिया कैसन लागेला, जैसे हरियर मिरिचिया तितैया लागेला''[हे सखी, सासू का ताना मारना तुझे कैसा लगता है?.सखी उत्तर देती है-जैसे हरी मिर्च का तीखा स्वाद''  गीतों में वार्तालाप ,छेड़छाड़, नोक झोंक से भरा यह नाटक बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश, का लोकप्रिय, एवं प्रचलित ,अनिवार्य परम्परा है. ,यह रंग कर्म का वह पक्ष है जिसमे आवश्यकतानुसार पात्रों की संख्या घटाई, बढ़ाई जा सकती है.संवाद जोड़े जा सकते हैं, और इसमें सिर्फ महिलायें ही भाग ले सकती हैं. ऐसा भी कहा जा सकता है की पुरुषों की अनुपस्थिति मेंमहिलायें अपनी शक्ति और रुतबे का प्रदर्शन कर पुरुषोचित आचरण करती हैं ,स्वांग भरती हैं, वैसी ही वेश भूषा में सज धज कर तैयार होती हैं. या यो कहें की एक रात की सत्ता का वैभव प्रदर्शित कर राजसी सुख का अनुभव करती हैंइस नाटक में दूल्हा दुल्हन से लेकर पंडित, वैद तक सारी भूमिकाएं महिलायें ही निभाती हैं. पुरुष वेश धारण कर...विवाह होता है ,पंडित आते हैं और विवाह की सारी रस्मे दोहराई जाती हैं. ..हास परिहास के साथ. इसी बीच वर की माँ विवाह मंडप में सुहाग चुनरी ओढ़ कर घूँघट निकाले, ..एक अखंड दीप जला कर चुपचाप बैठी रहती है. जिसमे दो बातियाँ जलाई जाती हैं, कहते हैं जब विवाह समपन्न हो जाता है तब जलते जलते दोनों बातियाँ एकाकार हो जाती हैं,अर्थात वधू पक्ष के घर विवाह संपन्न हो गयाऔर आगे का जीवन मंगलमय रहेगा.फिर महिलायें खुल कर हास परिहास करती हुई मंडप के चारो और गोल घेरे में घूमती हुई  गीत गाती हैं जिसे ''झूमर'' कहते हैं. उन्मुक्तता इतनी की शारीरिक अंगो का उल्लेख कर एक दुसरे को छेड़ती हैं.और तरहतरह रोचक गीत गाकर  केवातावरण में उत्साह व् रस घोल देती हैं. ----''काला रे बालम मोरा काला,ससुर लाये बुढ़िया,  जेठ लाये जवानी, काला लाया रे सौत बारह बरस की ''-----फिर दूल्हा दुल्हन का चुमावन होता है.इसके पूर्व एक चारापाए के पाए को या लकड़ी के पाते को गीले आटे को थाप कर सिर का आकार दिया जाता है, इसमे नाक, मुंह बनाकरबच्चे की तरह कपडे पहनाकर कहीं छुपा दिया जाता है ताकि आने वाली वधू उसे देख न सके. इसे ''जलुवा'' कहते हैं.  कुछ हास परिहास के बाद दुल्हन गर्भवती हो जाती है.और इस जलुवे को ही पुत्र रुपमे जन्म दिलवाया जाता है. जलुवा की नाक, आँख बनाते समय भी महिलाए नाटकीय भाव भंगिमा से समझाती हैं की इसकी नाक लम्बी है, बहू लम्बी नाक वाली आयेगी, इसकी आँखें छोटी हैं बहू कानी आयेगी.गर्भवती महिला सासू, देवर, ननद ,जेठानी आदि से गर्भावस्था के दौरान तरह तरह की फरमाईश करती है,यह भी गाकर ही नाटक में व्यक्त किया जाता है ,वह कुछ मांगती है और पीछे से सारी महिलायें ''वाह वाह जी वाह वह ''कहती हुई ताल देती रहती हैं. ----
''ए बालम ,बनारस जैबे''--वाह वाह जी वाह वाह ''
बनारस के साड़ी लैबे''--वाह वाह जी वाह वाह ''
ए बलम, जलेबी खइबाइ-वाह वाह जी वाह वाह '
          इसी प्रकार यह नाटक आगे बढ़ता है,तब कोई महिला मछली बेचने वाली बन कर आती हैऔर मछली के मूल्य के रूप में उसे मांग लेती है. --''-माछ ले लो माछ,''                 
का भाव?  ''तोहरे भाव'' 
           इसी प्रकार फ़ूल वाली, मिठाई वाली, साग वाली, चाट पकौड़ी वाली का वेश धर कर नाचती गाती महिलाए आती रहती हैं और नाटक आगे बढ़ता है. सभी को विदा करते करते वधू को प्रसव वेदना शुरू हो जाती है,तब वैद की पुकार होती है धोती कुरता पगड़ी पहने कंधे पर लाठी लिए, लालटेन लटकाए वैद आता है,और उस गर्भवती महिला से इलाज के बहाने छेड़छाड़ भी करता है. और तमाम नाटकीय घटनाओं और हास परिहास के बाद बच्चे का जन्म होता है. और नाल काटने के लिए बैद चाक़ू मांगता है. तब कोई तलवार लाता है, कोई भाला, अंतत; एक भोंथरी सी छोटी छुरी से नाल काटी जाती हैकोई महिला बच्चे के स्वर में रोंती है और सारी माहिलायें उल्लास में भर सोहर गा उठती हैं----''गोकुला में बाजत बधैया,नन्द घर सोहर हो, ..ललना जन्मे हैं कृष्ण कन्हैया, महल में उठे सोहर हो''ले आओ सोने के हंसुवावा मै राम नार काटूँ, कन्हैया, नार काटूँ ,,ले आओ परी के सुपवा मै राम पवारावों हो. ''
          फिर बच्चा एक से दूसरे हाथों मेंगुजरता हुआ आशीषें पाता है,''बाबुल के घुँघर घुँघर बाल बहुत नीक लागे, अजब छवि लागेला हो, आहो ठुमक हुमक धरे पौंवाजसोदा जी के आँगन, अंगना सुहावन हो''---
            अंत में शिशु को वर की माँ के हाथो में सौंप कर उसके हाथो में चावल देकर सारी महिलायें चुमावन करती है, आशीष देती हैं. दुल्हन का स्वांग करने वाली महिला और बाकी अभिनेत्रियाँ को साड़ी, सिंदूर, अनाज और मिठाई का खोइंछा दिया जाता है. वहां उपस्थित सारी महिलाओं को खीर पूडी खिलाकर तेल सिंदूर देकर विदा किया जाता है.
            आज कल यह परम्परा लुपप्राय हो रही है. क्योंकि बरात में महिलायें भी जाने लगी हैं. और इसे करने का उत्साह भी पहले जैसा नहीं रहा. बढ़ती आधुनिकता ने हमारी अनेक परम्पराओं को भुला दिया है. मनोरंजन के अनेक साधनों के आ जाने के कारण व् महिला संगीत के नाम पर पश्चिमी धुनों पर थिरकने के जूनून ने इस लोक नाट्य परम्परा को लगभग विस्मृत कर दिया है. ....हम अपनी परम्पराओं को भूलें नहीं, उसका उत्सव मनाएं ताकि कुछ पल के लिए ही सहीइनमे भाग लेने से आपसी कटुता दूर होती है, हास परिहास से मन की बोझिलता कम होती है. और सामाजिक समरसता तो बढ़ती है ही।

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