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रविवार, 22 मार्च 2020

लाल देवेन्द्र कुमार श्रीवास्तव की कविताएं

लाल देवेन्द्र कुमार श्रीवास्तव

■ दीवार पर टँगी तस्वीर ■

घर के ड्राइंग रूम के दीवार पर 
श्याम श्वेत रंग की टँगी 
एक पुरानी सी तस्वीर
जब भी देखता हूँ उस तस्वीर को
जिसमें दादा दादी माँ बापू संग
ढेरों यादें सामने आने लगती हैं
छोटा भाई व प्यारी बहन
तस्वीर लगता जैसे बोलती है
चलचित्र की तरह घूम जाता है
वह तस्वीर जो आज भी निशानी है
जिसमें बचपन की ढेरों कहानी है
दादा संग बाज़ार को जाना
ज़िद कर खिलौनों को लाना
घर आते ही शुरु होती लड़ाई
खिलौना कभी मैं लेता कभी लेता भाई
बहना तो कभी न पाती
फिर शुरु होती उसकी रुलाई
चौके में नीचे साथ बैठ कर खाना 
पढ़ने के लिए कितना होता बहाना
गाँव का वह प्राइमरी स्कूल
पढ़ने के लिए हाथ पे पढ़ता था रूल
दोस्तों संग पढ़ना लिखना
खेल खेलना और था झगड़ना
रात में दादी के लोरी कहानी को सुनना
उस एक पुरानी तस्वीर में 
एक युग है समाहित
बापू का हमको नसीहतों को देना
भोर होते ही पढ़ने को उठाना
सारे पाठ को याद करके सुनाना
गाँव का वह घर आता है याद
साईकल खरीदने को मम्मी से फ़रियाद
याद आते चाचा चाची व गाँव के लोग
छोटे से घर में सब रहते थे प्रसन्न
न ही शिकायत न रहता कोई खिन्न
मिल जुल कर सब रहते थे साथ
घर के कामों में सब बटाते थे हाथ
काश! वह लौट आए बचपन
रिश्तों में रहता था कितना अपनापन।।



 ■ सीता की अग्नि परीक्षा ■

अतीत से वर्तमान तक,
सीता की अग्नि परीक्षा होती आई है,
आखिर! कब तक,
क्यों! नही किसी युग में हुई,
राम की भी अग्नि परीक्षा,
नारी तो है जीवन आधार,
उससे ही बनता घर परिवार,
नारी ही तो माँ, बेटी, बहन किरदार,
फिर क्यों! नारी पर ही 
लटकती है तलवार,
आखिर! हर बार उसके सतीत्व पर, 
उंगली है उठती,
आखिर! हर युग में 
नारी ही क्यों! है सहती,
वह ही अकेले अग्नि परीक्षा है देती,
क्या राम गलत नही हो सकते?
फिर वह क्यों! न अग्नि परीक्षा देते,
आज भी जब नारी 
घर से निकलती है,
सबकी निगाहें उसे ही घूरती है,
रात में यदि नारी देर से आए,
उसके ऊपर ढेरों शामत मंडराए,
घर का हर शख़्स देरी का कारण, 
जानना चाहता है,
ढेरों प्रश्न पूछना चाहता है,
बाहर तो अकेले पाकर हर कोई, 
नारी को निगलना चाहता है,
आज भी सीता को हर दिन, 
अग्नि परीक्षा देनी है होती,
नारी को घर व बाहर अपनी रक्षा, 
ख़ुद ही करनी होती,
पुरूष रहे रात रात भर गायब,
उससे नही होती कुछ भी, 
पूछने की  कवायद,
नारी कितना भी करे समर्पण,
पर पुरुष को दिखाना है, 
उसे अपने सतीत्व का दर्पण,
पिता, भाई, बेटा है पुरुषोत्तम राम,
गलत हो तब भी वो 
आदर्श का आयाम,
सीता को ही देनी होगी अग्नि परीक्षा,
नही चलेगी उसकी अपनी इच्छा,
पुरूष प्रधान समाज में सीता, 
न कर सकती प्रतिकार,
उसे अब भी एक गलती पर, 
मिलेगा तिरस्कार,
अग्नि परीक्षा देकर ही, 
सीता पा सकती है पुरूस्कार,
तभी समाज करेगा सीता को स्वीकार।।

★सूरज की पहली किरण★

सूरज की पहली किरण 
जब धरा पर आती है
रात का तम मिटाती है
करती है पृथ्वी पर
प्रकाश का विस्तार
सभी प्राणियों में नई ऊर्जा
स्फूर्ति का करती है नव संचार
पनपती है नित नई आस
जीवन के प्रति दृढ़ होता है
एक नया विश्वास
सूरज की पहली किरण
कितना कुछ बदल देती है
हमारे जीवन के भी 
तिमिर को भी हर लेती है
अतीत में हुई गलतियों से
हम सबक सीखते हैं
उस पर करते हैं चिंतन मनन
फिर सफ़ल हो जीतते हैं
हम में भर जाता है 
कितना ऊर्जा व उत्साह
और ख़ुशी से हम जीवन जीते हैं
सूरज की पहली किरण की तरह
औरों के जीवन में 
हम भी प्रकाश भर सकते हैं
उन्हें ख़ुशियाँ दे सकते हैं।



 ★ प्रेम का एसास ★

माँ का गोदी में बच्चे को दुलराना
कुम्हार का दीये बनाना
ये सूरज चाँद सितारे
सब में प्रेम के होते इशारे।।

रात में हम देखते 
प्रियतम के सपने
उष्ण में वर्षा का जल
किसान को लहलहाते फसल
नदियों में कल कल बहता जल
ये सब मचाते हैं प्रेम के हलचल।।

आम के पेड़ पर जब 
कोयल की कूक
गुलाब व चंपा के 
फूल की महक
मंदिर में बजते हैं घंटे
मस्जिदों में होते हैं अज़ान
हम पढ़ते हैं रामायण या क़ुरान
सब में प्रेम का मिलता है ज्ञान।।

प्रेम में टूटती हैं 
जाति धर्म की वर्जनाएँ
खत्म हो जाती है 
नफ़रत की दीवार
हर चीज में लगता है अपनापन
बस! होता है दीवानापन
प्रेम अमर है
प्रेम को मिटा नही सकते
उसमें हमें बहना है
प्रेम में हमें जीना है।।


 ★ प्रेम क्या है....★

प्रेम क्या है!
मन की अभिव्यक्ति है
मन का एक भाव है
एक मनोदशा है
जीवन सुंदर से जीने की कला है
एक दूसरे से मनुहार है
दो प्रेमियों के 
दिल का इज़हार है
प्रेम जीवन का सुंदर सा गान है
संगीत का मधुर सा तान है
जीवन के लिए वरदान है
जो समझते हैं 
उनके लिए प्रेम आनंद है
बगिया के महकती फूलों की सुगंध है
प्रेम में जीवन की मुस्कान है
प्रेम के बिना न ही 
जीवन का विज्ञान है
प्रेम जल की अविरल धार है
जीवन का यही सार है
सच! प्रेम ही जीवन का आधार है
सोंधी सोंधी महकती बयार है
जिससे जीवन होता गुलज़ार है
कृष्ण के बाँसुरी से 
निकली मधुर तान है
राधा को तान से बुलाना 
प्रेम का आह्वान है।।

        ★ ये हमारी जिंदगी...★

फुलों के ख़ुशबू सा महकाती है जिंदगी,
कई रिश्तों को प्यार से निभाती जिंदगी।
दुःख में एक दिन होता बीतना मुश्किल,
कभी सपनों को सच में सजाती जिंदगी।।

कभी रोटी का मोहताज बनाती जिंदगी,
कभी सिर पर ताज सजाती भी जिंदगी।
कभी हम मस्ती में हैं ख़ूब झूमते नाचते,
कभी दिल बेज़ार कर रुलाती जिंदगी।।

कभी हमें बदहाल कर जाती  है जिंदगी,
कभी भरपूर मालामाल बनाती जिंदगी।
कभी ख़्वाब हक़ीक़त में न बदलते हमारे,
कभी सच में भी निहाल करती जिंदगी।।

कभी ग़ैरों को अपना  बनाती है जिंदगी,
अपनों को बिछुड़ना दिखाती है जिंदगी,
कभी कितने गहरे ज़ख्म देती है जिंदगी,
कभी कैसे कैसे हमें नचाती है जिंदगी।।

कभी कैसी ख़ूबसूरत सी लगती जिंदगी,
कभी घिन आती बदसूरत सी हो जिंदगी।
कभी ख़ुशियाँ हजार, कभी दुःख की मार,
कभी ममता की मूरत लगती है जिंदगी।।

कभी घोर निराशा हमें दे जाती ये जिंदगी,
कई अभिलाषा को मन में जगाती जिंदगी।
सुंदर सी मिली जिंदगी व्यर्थ न करो यारों,
दुःख के बाद सुख की दिलासा दे जिंदगी।।
 
                                               ★ प्यार से जीवन महकाएँ..★

प्यार की ख़ुश्बू से ही जीवन महकाएँ,
नफ़रत के काटों को फूलों से सजाएँ।
प्रीत के गीतों का सदा सृजन करें हम,
जीवन को सदैव ही ख़ुशहाल बनाएँ।।

सद्कर्म की कोशिश  परिवर्तन लाएँ,
सच पर ही चलकर मंजिल को पाएँ।
झूठ कपट बैर से जीना होता मुहाल,
जिस पर चलकर हम सदा पछताएँ।।

कठिन यत्न से कार्य को सफल बनाएँ,
पूरी ताकत को लगाकर ही आजमाएँ।
कोई भी साथ न दे परवाह न करें हम,
सतत प्रयास से हम मंजिल को पाएँ।।

क्या लोग कहेंगे इसको मन में न लाएँ
सही लक्ष्य पर  सदैव हम तीर चलाएँ।
अवरोध बहुत आएँगे  सत्पथ पर मेरे,
दूर उन्हें कर हम आगे ही बढ़ते जाएँ।।

कोशिश करने से पहले ही न हार जाएँ,
असफलता  से मन में निराशा न लाएँ।
चाहेंगे लोग हम प्रगति में पीछे  ही रहें,
डर कर हम कहीं  नीचे  न  गिर जाएँ।।

हम सच पर बढ़ते रहें पीछे न मुड़ जाएँ,
जीवन में ईमान को कभी न डगमगाएँ।
ऊँचाई पर होने का सदैव हमारा ख़्वाब,
संघर्ष से  इतिहास में नाम दर्ज कराएँ।।
 
 
साहित्यिक परिचय 
नाम--  लाल देवेन्द्र कुमार श्रीवास्तव
स्थायी पता--ग्राम-कैतहा,पोस्ट-भवानीपुर, जिला-बस्ती
                  272124 (उत्तर प्रदेश)
मोबाइल 7355309428
ईमेल  laldevendra706@gmail.com
शिक्षा--बी. एससी.,बी. एड., एल. एल बी., बी टी सी.
( शिक्षक, कवि, लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता )
लेखन की विधा--कविता/कहानी/लघुकथा/लेख/बाल कविता
प्रकाशन-संगिनी, साहित्यनामा, साहित्यञ्जली प्रभा, सत्य की मशाल, लोकतंत्र की बुनियाद, कविताम्बरा, रचना उत्सव, काव्य कलश,जय विजय, जयदीप, विचार वीथिका, साहित्यनामा(द फेस ऑफ इंडिया), खुश्बू मेरे देश की, उजाला मासिक, शब्द शिल्पी, माही संदेश पत्रिका, सच की दस्तक, अनुभव, बचपन, संगम सवेरा, अविचल प्रभा, रजत पथ, सेतु, आदित्य संस्कृति, द अंडरलाइन, देवपुत्र, बच्चों का देश, आदि पत्रिकाओं में 160 से कविताएं, कहानियां व लघुकथा प्रकाशित व राष्ट्रीय स्तर अधिकतर समाचार पत्रों में अब तक 500 से अधिक रचनाओं का प्रकाशन साथ ही साँझा काव्य संकलन "साहित्य सरोवर","काव्यांजलि", "बंधन प्रेम का" "अभिजना", "अभीति", "काव्य सरोवर", "निभा", "काव्य सुरभि", " पिता" प्रकाशित व लगभग आठ साँझा काव्य संकलन व एक लघुकथा साँझा संकलन प्रकाशन के अधीन।
साथ ही "नव किरण" का संपादन।
सम्मान-- "साहित्य सरोवर",साहित्य साधक अलंकार सम्मान-2019,"काव्य भागीरथ सम्मान" "अभिजना साहित्य सम्मान" वीणा वादिनी सम्मान-2020, " काव्य श्री सम्मान-2020" सहित दो दर्जनों से अधिक साहित्यिक सम्मान व कई सामाजिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित।

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