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मंगलवार, 10 दिसंबर 2019

कृष्ण भारतीय : नवगीत


नवगीत - १

कोई तो रस्ता निकाला जायेगा.......!



बाँह भर आकाश पाने के लिए -
पंख भी तो हों उडानों के लिए ।

ये क्षितिज इस पार से उस पार तक ,  
सिरफ बाजों के लिए -
फैला हुआ ;
एक चिड़िया सोचती ही रह गयी ,
क्यों सफर उसके लिए -
मैला हुआ ;

हौसलों का साथ भी तो चाहिए -
शून्यपथ को आज़माने के लिए ।

चंट बाजों के क़बीले हँस दिए ,
बाँटकर टुकड़े कई -
आकाश के ;
जंगलों के नीड़ की सहमी प्रजा
डोर है थामे हुए -
विश्वास के ;

कोई तो रस्ता निकाला जायेगा -
इस विरासत को बचाने के लिए ।

सब सशंकित एक दूजे के लिए ,
कौन है प्रतिबद्ध या -
चेहरे मढ़ा ;
होड़ में शामिल सभी बेचैन हैं ,
क़द दिखाने को कि हूँ -
तुझसे बडा ;

नीतिगत संघर्ष को मत बोलिये -
मुँह  चुराते  हैं  बहाने  के  लिए ।


नवगीत - २

आज ठहाके ओठों के अनदर हैं मरे मरे.....!



पूरा  जीवन कटा  विहँसते  बाग  बगीचों में ,
और सफर करते आ ठहरे बीहड़ मरुथल में ,
जहाँ पेड सूखे , पत्थर , रेतीले टीले हैं ।

दूर दूर  तक  हवा  कँटीली  या -
सन्नाटे हैं ;
हमने तो उत्सव मेलों में ही दिन -
काटे हैं ;
भूखी चीलों का  क्रंदन डर पैदा -
करता है ;
घर में इक टूटा सा खंडहर पैदा -
करता है ;

हम जीवन भर  चले घास के  नर्म ग़लीचों में ,
अन्त पहर क्यों साँस घुटी ऐसे अन्धे कल में ,
जहाँ दलदली मिट्टी है सब पेड कँटीले हैं 

आधे बादल  बरस  रहे  हैं  आधे -
सूखे हैं ;
सब अध्याय लगे जो मौलिक रस के -
भूखे हैं ;
बाहर के पतझर की  अब तू बात ,
न कर प्यारे -
बाहर से अन्दर  के मौसम ज़्यादा -
रूखे हैं ;

हम हैं स्वर्ण खाल सी ओढ़े मृग मारीचों में ,
बिंधे वाण से तड़प रहे हैं  निर्जन जंगल में ,
रावण के बंधक हैं सम्मुख राम रसीले हैं ।

वो  भी  था  परिवेश  कि  रीते  थे -
पर भरे भरे ;
अब भौतिक सुख लदे कहीं अन्दर -
पर डरे डरे ;
पहले  फक्कड थे शाहीपन  था ,
व्यवहारों में -
आज ठहाके  ओठों  के अन्दर  हैं -
मरे मरे ;

तिलक भजन की होड़ लगी है कपटी चेहरों में ,
डूब  मरेंगे  सब  बहकर इस  गंगा  के जल  में ,
ये विभीत्स चेहरे जो लगते नीले पीले हैं ।


नवगीत - ३

बताओ ! हम कहीं ठहरे कहाँ है.....!



वो अपने रात हो दिन हो ,
भले  ये ज़िन्दगी  पिन हो ,
बताओ । हम कहीं ठहरे कहां हैं ?

बन्द दरवाजे  मिले -
सब शहर के घर के ,
धूप के  जलते  सफर में छाँह  तो मिलती ;
पांव जख्मी टीसते थे -
लड़खड़ाते थे ,
इक तसल्ली को भली सी बाँह तो मिलती ;

लोग हंसते थे मियां । 
हम सब समझते थे ,
खूब सुनते कान हैं , बहरे कहां हैं ?

बस्तियों के मौन सन्नाटे -
हवायें जड गयीं चांटे ,
सभी गूँगे  भला  संवाद  किससे  हो ; 
भूख की आँखों भरी भाषा -
समझता कौन परिभाषा ,
कि अंधे राज्य में अनुवाद किससे हो ;

कभी हम ऊब जाते हैं ,
भ्रमित से डूब जाते हैं ,
बताये कौन हमको ताल ये गहरे कहाँ हैं ?

दुखी होकर जो चिल्लाये -
वो आंखें लाल कर आये ,
कभी पूछा नहीं क्या दर्द है क्यों शोर करते हो ;
जो बोलें जान लेते हैं ,
भॄकुटियां तान लेते हैं ,
पुराना रोग कहकर  घूरते क्यों बोर   करते हो ;

हमें दुर्गत नहीं झिलती ,
उन्हें फुर्सत नहीं मिलती ,
यों कहते जब चले आना यहां पहरे कहाँ हैं ?



( कृष्ण भारतीय )

पता - बेस्टैक पार्क व्यू रेजीडेन्सी ,
मोबाइल - 09650010441
ईमेल - kbhasin15@gmail.com


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